मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

सोमवार, 24 जुलाई 2017

इस गली में आना छोड़ दो






                               इस गली में आना छोड़ दो

                           रे चाँद,
                 हर रात, इस गली
                 आया न करो.
                 इस गली आना छोड़ दो.
                       
                             
               
                 आते तो हो
, इस बहाने
                 कि अँधियारी रात को
                 शीतल मद्धिम उजाला दे दो.

                 पर तड़पा जाते हो
                 न जाने कितने विरहनियों को
                 सागर की लहरें
                 तुम्हें प्यार करने लगीं हैं

                 उठ उठ कर,
                 सागर को छोड़
                 तुम तक पहुँचने और
                 मधुर मिलन को आकुल
                 अथक प्रयास करती रहतीं हैं,
                 निशि दिन, पर हाय निरर्थक.
                 पहुँच नहीं पातीं तुम तक
                 फिर भी वे रुकती नहीं हैं.
                 क्यों करते हो उन्हें परेशान?

                 उधर चातक बेचारा,
                 मुँह बाए खड़ा रहता है,
                 शीतलता की एक बूँद के लिए,
                 तुम्हें निहारता ही रहता है,
                 पता नहीं, उसकी प्यास कब बुझेगी,
                 बुझेगी भी कि नहीं?

                 इनके साथ तड़पते हैं
,
                 एकाकीपन लिए
                 प्रियतम - प्रियतमा
                 अलग अलग
                 अपनी अपनी ठौर !!!

                 कई तो तुमसे ही
                 आस रखते हैं
                 साजन - सजनी को
                 संदेशा पहुंचा दो,

                 और तुम हो कि
                 खुद बनते हो
                 उनकी वेदनाओं का कारण.
                 क्यों बनते हो?
                 
                 कोई जरूरी है
                 रोज इस गली की सैर करना,
                 रोज इस गली की
                 खाक छानना !!! और
                 सबको विरह की वेदना देना,

                 सोचो समझो,
                            अब इस गली में आना छोड़ दो,
                 इस तरह इस गली आया ना करो.
                ------------------------------------

बुधवार, 31 मई 2017

निर्णय ( भाग 2)


निर्णय (भाग 2)
                                                  (भाग 1 से आगे)

रजत भी समझ नहीं पा रहा था कि कैसे अपनी भावना संजना तक पहुँचाए। डर भी था कि संजना उसकी बात से नाराज हो गई तो वह उसे हमेशा के लिए ही खो देगा। वह अजब पशोपेश में पड़ा हुआ था।

कॉलेज के वार्षिकोत्सव में रंजना ने कई कार्यक्रमों में भाग लिया था । एक नाटिका में रजत भी साथ था । प्रेक्टिस के दौरान एक दूसरे को समझने के जानने के मौके   मिले । संजना अक्सर रजत की पसंद की चीज़ें टिफिन में लाती और उसे खिलाती। अपने प्रेम की अभिव्यक्ति का एक यही तरीका मालूम था उसे।

कालेज के पिछले हिस्से में बड़ा सा हरा भरा उपवन और एक मंदिर था। वहाँ कई सघन वृक्ष थे। उनमें से एक गुलमोहर का वृक्ष संजना को बड़ा प्रिय था। वह और रजत कभी कभी गुलमोहर के नीचे बैठते थे तब मजाक में रजत कहता, -

'चलो, ये गुलमोहर तुम्हारे नाम कर दूँ।

इस पर तुम्हारा नाम लिख दूँ?'

जब वह गुलमोहर पर नाम लिखने के लिए तैयार होता तो संजना रोक देती। 

कहती, " मुझे फूलों से ढँका देखना है इस गुलमोहर को, परंतु फूल तो आएँगे मई में और तब तो हम कॉलेज छोड़कर जा चुके होंगे। अप्रेल में परीक्षाएँ हो जाएँगी, तब कौन आएगा यहाँ ?"

रजत - "मैं आऊँगा। तुम भी आना, उन फूलों को अपने आँचल में भर लेना...ढ़ेर सारे !"

इस तरह प्रेम की अदृश्य निर्मल सरिता उन दो दिलों में बहती रहती। 
संजना मध्यमवर्गीय परिवार से थी और बारहवीं के बाद से ही टयूशन्स पढ़ा कर स्वयं पढ़ती थी।

रजत ने उसके बारे में तो सब पूछ लिया था लेकिन अपने बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया था, सिर्फ इतना कि उसके माता पिता गाँव में रहते हैं और वह यहाँ चाचा चाची के पास रहकर पढ़ता है। 
न ही संजना ने उससे कुछ पूछा.

गुलमोहर उनके अनकहे प्रेम का मूक साक्षी हो गया था। 

संजना को रजत का आत्मसंयम व शालीन व्यवहार बहुत प्रभावित करता था। वह अपने गीतों और कविताओं को संजना को सुनाता। कुछ गीतों में छिपे संदेश को समझकर संजना की नजरें झुक जाती।

आखिर वार्षिकोत्सव का दिन आ गया। सारे कार्यक्रम सफल रहे। 

संजना ने गायन स्पर्धा में अपना प्रिय गीत 

'हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू' गाया. 

तो रजत को महसूस हुआ कि यह गीत सिर्फ उसी के लिए गाया गया है। कार्यक्रम पूरा होते ही उसने संजना को ढूँढ़ा और एक मुड़ा हुआ कागज उसके हाथ में देकर कहा, "इसे पढ़ लेना बाद में।"

संजना कुछ कह पाती तब तक रजत को ढूँढ़ते हुए दीपक वहाँ पहुँच गया। बात अधूरी रह गई।

संजना ने वहीं कागज खोल कर पढ़ा। कुछ लिखा था....

लिखा था -'संजना, तुम मेरी प्रेरणा हो।'

उन शब्दों ने संजना से वह कह दिया जो अन्य किसी भी तरह व्यक्त कर पाना संभव ही नहीं था। रात भर में संजना ने उन पाँच शब्दों को पाँच सौ बार पढ़ा होगा। लेकिन प्यार के उस उपहार को पाकर खुश होने के साथ साथ उसकी आँखें बरस भी रही थीं। मन घबरा सा रहा था। पिताजी के क्रोध की कल्पना थी उसे !

अगले दो दिन वह रजत से अकेले मिलने से बचती रही। जवाब माँगेगा तो क्या कहेगी ? इधर घर में उसकी सगाई की बात चल रही थी। अगले सप्ताह लड़के के घरवाले उसे देखने आने वाले थे। आखिर उसने सोच लिया कि वह रजत से खुलकर बात करेगी। कब तक छुपाएगी अपनी भावनाओं को? अगले महीने प्रिलीमिनरी परीक्षाएँ शुरू हो जाएँगी। 

इस तरह मन भटकता रहेगा तो पढ़ाई कैसे होगी ?

अगले दिन लेक्चर्स के बाद उसने स्वयं जाकर रजत से कहा कि उसे कुछ कहना है।
दोनों अपनी पसंदीदा जगह गुलमोहर के नीचे जा बैठे। बात रजत ने ही शुरू की –

"संजना, तुम मुझे पसंद करती हो?"

संजना ने एक बार उसकी ओर देखकर पलकें झुका लीं।

रजत - "मैं तुम्हारी खामोशी को हाँ समझता हूँ। तुमने कभी मेरे बारे में जानना नहीं चाहा। 
संजना, मैं तुम्हें धोखे में नहीं रखना चाहता। 

हमारे यहाँ शादियाँ बहुत कम उम्र में हो जाती हैं। 
मैं सोलह वर्ष का था, तभी पिताजी के एक मित्र की बेटी से मेरी शादी कर दी गई। 
मैं विरोध भी नहीं कर पाया। 
अभी गौना बाकी है। 
मेरी पत्नी जिसे मैंने कभी पत्नी नहीं माना, वह अपने मायके में है। 
मैं उस लड़की को जानता नहीं, प्यार नहीं करता
कैसे निबाहूँगा उसके साथ
संजना, तुम मेरी बात समझ रही हो ना ?"

संजना अब तक वैचारिक तूफानों में घिर चुकी थी.
इतना बड़ी बाचत अब तक छुपाए रखी.
मैं और मेरा प्यार किसी को अपने अधिकार से वंचित कर रहा है.
मैं एक स्त्री होकर एक स्त्रीका हक कैसे मार सकताी हूँ
मेरा प्यार साझा भी तो नहीं किय़ा जा सकता, उस यौवना से...

अनायास इन वैचारिक तूफानों से गिरे संजना ने एक कठोर जीवन निर्णय ले लिया.

उधर रजत कह ही रहा था -

"संजना, प्लीज मुझे गलत मत समझो। 
मैं उससे तलाक ले लूँगा। 
तुम मेरी प्रेरणा हो
मेरी कविता, मेरे गीत सब तुमसे हैं। 
तुम मेरा साथ दोगी ना ? कुछ तो बोलो..."

संजना कई क्षणों तक सुन्न सी बैठी रह गई। 
फिर उसने धीरे से रजत के दोनों हाथ पकड़कर खुद से दूर कर दिए। 
बिना एक भी शब्द बोले उसने अपना पर्स उठाया और शिथिल कदमों से वहाँ से चली गई। 

रजत में इस खामोश तूफान का सामना करने की हिम्मत नहीं थी। 
वह स्तब्ध सा वहीं बैठा रहा।

उसके बाद संजना एक सप्ताह तक कॉलेज नहीं आई। 
दिशा के हाथों उसने छुट्टी का प्रार्थना पत्र भेज दिया था। 
सबको यही पता था कि वह कजिन की शादी में जयपुर गई है।

एक सप्ताह बाद संजना कॉलेज आई तो उसके दोनों हाथों में गहरी लाल मेंहदी रची हुई थी और अनामिका में एक खूबसूरत सी सोने की अँगूठी थी। उसने हल्के पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी। लंबे घने बालों की ढीली चोटी लहरा रही थी।  

"हाय ! कहाँ गुम हो गई थी इतने दिन?"

संजना को देखते ही सहेलियों ने उसे घेर लिया। तब तक मेंहदी और सगाई की अँगूठी पर उनकी नजर पड़ चुकी थी। 

"एन्गेजमेंट ? सच्ची ? इतनी बड़ी खुशखबरी छुपाई हमसे !
सोचा होगा सगाई में सारी क्लास को बुलाना पड़ेगा !
चलो, कोई बात नहीं, शादी में सारी कसर निकालेंगे।
बधाई हो,संजना !"

बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया था, सबकी नजर बचाकर संजना ने आँखों की कोरों पर रुकी बूँदों को पोंछ लिया। 

तब तक विस्मय विमूढ़ सा रजत खुद को सँभालते हुए आगे आया और कहा
 "बधाई हो संजना !"

इसके बाद एक क्षण भी वहाँ रुकना उसे भारी हो रहा था। वह थके थके कदमों से क्लास से बाहर चला गया।

आज पच्चीस वर्ष गुजर गए । संजना अपने पति और दो बेटों के साथ संतुष्ट और खुश है। परीक्षा के बाद उसने कभी रजत को नहीं देखा, ना ही उसके बारे में जानने की कोशिश की। 

पर हर साल जब गुलमोहर खिलता है या कोई फूलों से लदा गुलमोहर का पेड़ दिखता है तो  संजना को वे दिन जरूर याद आते हैं. 

अपने निर्णय पर वह बहुत खुश है, उसे कोई पछतावा नहीं है 

संजना को आज भी लगता है कि उसका निर्णय समय पर और सही था.
......                                                              (संपूर्ण)

शुक्रवार, 26 मई 2017

निर्णय (भाग 1)

निर्णय ( भाग -1)


बी एड में अलग अलग कॉलेजो से आए हुए अलग अलग विधाओं के विद्यार्थी थे । सबकी शैक्षणिक योग्यताएँ भी समान नहीं थीं । रजत इतिहास में एम ए था । उसे लेखन का शौक था और वह बहुत अच्छा वक्ता भी था । उसके लेख व कविताएँ अक्सर पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे । प्रिया ने बी कॉम किया था. दिशा ने एम ए बीच में ही छेड़कर बी एड करने का फैसला लिया था घर की मजबूरियों के कारण. संजना ने बी ए किया था और बी एड के बाद एम ए करने का सोचा था । उसे भी लिखने का शौक था लेकिन घर के माहौल के कारण वह अपनी कविताएँ और शायरियाँ सबसे छुपाकर रखती थी । पिताजी पुराने विचारों के थे और दसवीं कक्षा के बाद आगे पढ़ने की अनुमति संजना को बहुत सी अलिखित शर्तों पर ही मिली थी।

सत्र जुलाई में शुरू हुआ था और बी एड कॉलेज में हर वर्ष की तरह गुरूपूर्णिमा का कार्यक्रम मनाया जाने वाला था। प्रशिक्षु शिक्षक एक दूसरे से परिचित हो जाएँ और उनमें छिपी प्रतिभा भी सामने आए यही इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य था। कार्यक्रम में कई प्रतिभाएँ सामने आईं। रजत ने अपनी कविताएँ पढ़ीं तो सभागृह तालियों से गूँज उठा। प्रिया ने भरतनाट्यम से समां बाँध दिया। अब संजना की बारी आई उसने मीरा का भजन गाना शुरू किया.....

        "ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद ना जाणे कोय"

मंत्रमुग्ध से सभी सुनते ही रह गए। आवाज में मधुरता के साथ दर्द का अनोखा संगम था। कार्यक्रम पूरा होने के बाद जलपान के साथ एक दूसरे से मिलने मिलाने का दौर शुरू हुआ। संजना अपनी सहेलियों के साथ बातों में व्यस्त थी और दूर खड़ा रजत उसे एकटक निहारे जा रहा था। अचानक संजना का ध्यान उस तरफ गया। दोनों की नजरें मिल गईं और रजत ने झेंपकर आँखें चुरा लीं ।

अगले दिन क्लास में पहुँचते ही संजना का सामना रजत से हुआ। औपचारिकता के नाते मुस्कुराहटों का आदान प्रदान हुआ। रजत तो मानो बात करने का बहाना ढूँढ़ रहा था।

रजत --"आप बहुत अच्छा गाती हैं।"
संजना --"आप भी अच्छा लिखते हैं, मुझे पसंद आईं आपकी कविताएँ।

बात वहीं रूक गई क्योंकि सामने से राघवन सर आ रहे थे। राघवन सर सोशियोलॉजी पढ़ाते थे। लेक्चर शुरू होने के पाँच मिनट पहले ही सर क्लास में पहुँच जाते थे।

संजना हमेशा दरवाजे के सामने वाली पहली बेंच पर बैठती थी। उसके पीछे उसकी दोनों सहेलियाँ दिशा और प्रिया बैठती थीं। लड़कियाँ एक तरफ, तो लड़के दूसरी तरफ बैठते थे। सोशियोलॉजी विषय जरा नीरस सा लगता था। दिशा और प्रिया जरा ज्यादा ही बोर हो रहे थे और राघवन सर के लेक्चर में जरा सी भी बात करना खतरे से खाली नहीं था। पर करें तो क्या करें ? चलो, लिखकर बातें करते हैं.

दिशा ने नोटबुक में लिखा - 

"प्रिया, यार ये सोशियोलॉजी किसने बनाई है ?" 

पास बैठी प्रिया ने पढ़ा और उसी के नीचे लिखकर जवाब दिया - 

"मुझे क्या मालूम ? रुक, संजना से पूछते हैं।"

राघवन सर बोर्ड की तरफ घूमे कि संजना ने हलका सा सिर घुमाकर दोनों को चेताया - "प्रिया, दिशा, सर देख रहे थे तुम दोनों को।"

तब तक नोटबुक संजना की बेंच पर सरका दी थी दिशा ने ।

संजना ने उसे खोला और पढ़ा। एक शरारती मुस्कान उसके चेहरे पर बिखर गई। उसने नीचे लिखा - "मुझे लगता है, राघवन सर ने ही बनाई होगी।"

नोटबुक फिर पिछली बेंच तक पहुँचाने के चक्कर में संजना पकड़ी गई।

"संजना, स्टैंड अप ! "राघवन स्वर की गंभीर आवाज के चढ़े स्वर से संजना चौंककर खड़ी हो गई।

"क्या चल रहा है ?
कब से देख रहा हूँ मैं तुम तीनों को।
इधर लाओ वो नोटबुक।"

संजना ने जरा सी गर्दन तिरछी कर पीछे बैठी प्रिया को घूरा कि - मुझे फँसा दिया ना !!
प्रिया ने हलके से आँखों में ही इशारा किया कि 'जा यार, दे दे नोटबुक।

देखा जाएगा जो होगा सो।'   

लाचार होकर संजना ने नोटबुक सर के हाथ में पकड़ा दी। कुछ पन्ने पलटे सर ने और संवादों पर सरसरी नजर दौडाई।

एक व्यंग्य भरी मुस्कुराहट के साथ सर संजना को घूरते हुए सर की आवाज गूँजी, "अच्छा, तो सोशियोलॉजी मैंने बनाई है?" 
सर के इतना कहते ही सारी क्लास में हँसी की लहर दौड़ गई और सबकी नजरें संजना पर टिक गईं।

"आपसे मुझे ये उम्मीद नहीं थी संजना ।
मत भूलो कि आप लोग भावी शिक्षक हो । बचपना छोड़कर जरा गंभीर होना सीखो...."

एक लंबा चौड़ा भाषण दिया सर ने और अंत में नोटबुक संजना को लौटा दी। वह रुआंसी हो चली थी।

अनायास ही उसकी नजर लड़कों की अंतिम पंक्ति में पहली बेंच पर बैठे रजत पर चली गई जो मंद मंद मुस्कुरा रहा था।

राघवन सर के लेक्चर के बाद दो लेक्चर और हुए। संजना ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा. दिशा ने बात करने की कोशिश की पर कोई जवाब नहीं दिया। तीसरे लेक्चर के बाद आधे घंटे का ब्रेक था। जेसना मैम के जाते ही संजना प्रिया पर बरस पड़ी।

"तुम्हारी वजह से मुझे डाँटा सर ने..."

प्रिया - "अच्छा ! तुमने कुछ नहीं लिखा था उसमें

चलो, गुस्सा छोड़ो, कैंटीन चलते हैं।"

संजना - "तुम लोग जाओ, मेरा मन नहीं है।"

ब्रेक में दो चार लोग ही रह गए थे क्लास में। रजत मौका पाकर संजना के पास आया।

"आपको ज्यादातर गंभीर ही देखा है, आज पता चला कि आप शरारत भी कर लेती हैं।

संजना - "क्यों ? नहीं कर सकती? हर इंसान में एक बच्चा छुपा होता है, मुझमें भी है।"

रजत -"हाँ, वो तो दिख ही रहा है। आज भूखे रहना है ?"

संजना-"मेरा टिफिन है, पर खाने का मन नहीं। आप खाएँगे थोड़ा ?"

रजत-"निकालिए, नेकी और पूछ पूछ?"
इस तरह के छोटे छोटे वाकये क्लास में होते ही रहते और संजना और रजत को तकरार व मनुहार के मौके मिलते रहते।

नोंकझोंक होती पर रजत के मजाकिया स्वभाव के आगे संजना की नाराजगी टिक ना पाती।

अब अक्सर कॉलेज लाइब्रेरी में दोनों साथ पढ़ा करते। रजत जब भी कुछ नया लिखता, सबसे पहले संजना को सुनाता था।कुछ प्रेम कविताएँ भी लिखी थीं उसने, जो स्पष्ट रूप से संजना की ओर इंगित करती थीं। संजना भी रजत की ओर अजीब सा खिंचाव महसूस करने लगी थी, लेकिन संस्कार कुछ ऐसे पड़े हुए थे कि उस अनुभूति को प्रेम का नाम देने की हिम्मत ना होती।
-----                                          (क्रमशः)

दूसरा भाग - अआगले हफ्ते इसी दिन

सोमवार, 22 मई 2017

पुस्तक प्रकाशन





पुस्तक प्रकाशन

हर रचनाकार, चाहे वह कहानीकार हो, नाटककार हो या समसामयिक विषयों पर लेख लिखने वाला हो, कवि हो या कुछ और, चाहेगा कि मेरी लिखी रचनाएं पुस्तक का रूप धारण करें. हाँ शुरुआती दौर में लगता है कि यह  किसी के लिए थोड़े ही लिखी जा रही है, कि प्रकाशित कराऊं? पर बाद बाद में लगता है मेरी रचनाएं समाज दुनियाँ पढ़े और लोग मेरे रचनाकर्म को सराहें.

व्यक्तिगत संवाद भले रोक लिए जाएं पर सामान्य रचनाएं बाहर की ओर झाँकती हैं. पहले डायरी में, फिर दोस्त-सहेलियों के बीच, फिर ब्लॉग और पत्र पत्रिकाओं की तरफ से होते – होते, अंततः पुस्तक रूप में आने का निर्णय देर सबेर हो ही जाता है.  इसमें कुछ गलत भी नहीं है. अन्यथा कई बार तो पुस्तक प्रकाशन करें न करें की दुविधा में अच्छी रचनाएं डायरियों और कापियों में रहकर ही दम तोड़ देती हैं. उन्हें पाठकों तक पहुँचने का सौभाग्य ही नहीं मिलता.

और सब काम की तरह पुस्तक प्रकाशन के बारे में भी सोचना बहुत आसान है. बाह्य दृष्टि से बहुत सरल प्रतीत होता है. पर सही में प्रकाशित करने में कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं. हालाँकि सोच समझकर प्रकाशन का निर्णय लेने में भी बहुत समय लगता है, पर यह निर्णय लेना वास्तविक प्रकाशन करवाने से बहुत सरल साबित होता है. एक बार निर्णय हो जाए, तो काम शुरू किया जा सकता है.

सबसे पहला काम होता है - निर्णय लेना कि पुस्तक किस विधा एवं विषय पर होगी. अक्सर कविता, गीत, शायरी, कहानी, नाटक लिखने वाले लिखना शुरु होने के बाद ही ऐसा निर्णय ले पाते हें. तब उन्हें निर्णय करने में तकलीफ नहीं होती कि पुस्तक किस विधा पर होगी. पर कुछ ऐसे वक्त आते हैं जहाँ लगता है कि अपना ज्ञान बाँटने के लिए पुस्तक लिखी जाए. किसी विषय पर पकड़ देखकर साथी उकसाते हैं कि आप इस पर पुस्तक क्यों नहीं लिख देते. वहाँ यह निर्णय करना दूभर हो जाता है कि किस विषय पर लिखी जाए. एक से अधिक विधा के रचनाकार दुविधा में रह जाते हैं कि पुस्तक केवल कविता की हो या कविता-कहानियों की या कुछ और.

मान लीजिए निर्णय किया कि कविता की किताब (लिखनी है) प्रकाशित करनी है.

अब रचनाएं इकट्ठे करना का काम शुरु होता है. भाषा पर प्रमुख रूप से ध्यान देनी पडती है. पुनः-पुनः पढकर भाषा सँभालनी पड़ती है कि कोई गलत बात न बन जाए या कोई बनती बात न बिगड़ जाए. फिर आता है रचनाओं को क्रमबद्ध करना यह इसलिए भी जरूरी ही कि पुस्तक में प्रवाह हो. पाठक को यथा संभव बाँध कर रखा जाए. क्रमबद्ध करने से मतलब है कि व्याकरण की पुस्तक में सर्वनाम पहले और फिर संज्ञा न हो. जीवनी में पहले जन्म हो, फिर उपनयन, फिर शादी और फिर परिवार – ऐसा क्रम.

अब सवाल उठता है कि प्रकाशन कहाँ से हो. खासतौर पर नए लेखकों के लिए प्रकाशक पाना और चुनना अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या है. आज कल सेल्फ पब्लिकेशन हाउस तो कुकुरमुत्तों की तरह उगे हुए हैं.  कोई भी प्रकाशक अपनी पूरी जानकारी नहीं देता. परेशान करने के पचासों बहाने लिए बैठे होते हैं. खासकर रॉयल्टी के बारे में तो विश्वास ही नहीं  करना चाहिए, उनकी बातों पर. अच्छा हो हर बात लिखित में ही की जाए.

कुछ प्रकाशकों को चुनकर, उनको आवेदन प्रस्तुत करना होता है कि मुझे आपसे कविता (विधा) की पुस्तक प्रकाशित करवानी है. तब प्रकाशक आपकी रचना के नमूने मँगवाता है और निर्णय लेता है कि वह आपकी पुस्तक प्रकाशित करने में इच्छुक है या नहीं. यदि आपकी रचनाएं सम्मति पाती हैं तो प्रकाशक आपको अपनी शर्तें बताता है. उसमें यह सब भी होता है कि प्रकाशन में वह क्या - क्या करेगा और रचनाकार को क्या - क्या करना होगा. किस तरह से कितनी रकम कब - कब जमा करनी होगी इत्यादि. अलग - अलग प्रकाशकों से उत्तर मिलने पर जो सबसे ज्यादा सहमत होने योग्य हो, उसे चुना जाता है.

कवर पृष्ठ कैसा हो. उसे सोचना, खोजना, बनाना दूसरा प्रमुख काम हो जाता है. वैसे प्रकाशक कवर डिजाईन करते हैं. पर कुछ लोग अपनी पसंद का बनाना चाहते हैं. ऐसे लोग अपने कुछ चित्र प्रस्तुत करते हैं जिन्हें प्रकाशक कवर का रूप देकर पुस्तक का नाम और रचयिता का नाम अंकित करता है.

अब आता है प्रकाशक द्वारा दिए गए पुस्तक की प्रूफ रीडिंग करना. उसे बताना कि कहाँ किस तरह की गलती है और किस तरह सुधार करना है, गलतियाँ हों सुधार सुझाए. यह काम जरा पेंचीदा होता है. कई बार सुधार करवाने पड़ते हैं.

यहाँ मैं चाहूँगा कि प्रूफ रीडिंग पर विस्तार में जानकारी के लिए पाठक मेरा लेख एक पुस्तक की प्रूफ रीडिंग पढ़ें.  



कहाँ, किस तरह, क्या सुधार करना है, इसके लिए एक तालिका बनाकर देना सर्वोत्तम होता है. तालिका में क्रमाँक, पृष्ठसंख्या, पेरा या कविता के छंद का क्रमाँक, लाइन व त्रुटिपूर्ण खंड देते हुए, बताना होता है कि सही क्या हो. इस तरह कम से कम तीन बार तो करना ही पड़ता है. बड़ी रचनाओं या विशेष विधाओं में यह ज्यादा बार भी हो सकता है.

वैयाकरणिक सुधारों के साथ इसमें alignment (दायाँ – बायाँ), गद्य में मार्जिन जस्टिफिकेशन, फाँट टाइप और साइज, रंग, पृष्ठ संख्या, रचना क्रमाँक कई तरह की बातों पर ध्यान देना पड़ता है. फॉर्मेटिंग का विशेष ध्यान देना लेखक के लिए बहुत ही हितकारी होता है.

कवर पृष्ठ तैयार होने पर इसे ISBN के लिए भेजना पड़ता है. इसमें पुस्तक को एक दस अंकों वाला या तेरह अंको वाला एक क्रमाँक दिया जाता है जिससे यह पुस्तक दुनियाँ भर में जानी जाती रहेगी.

आई एस बी एन (ISBN) के लिए आवेदन के पूर्व प्रकाशक कुल रकम के 50 % की माँग करते हैं. सर्वोत्तम है कि राशि इंटरनेट से ही स्थानाँतरित की जाए. वैसे चेक द्वारा भी भुगतान हो सकता है.  कैश जमा करने पर अब बैंक वाले बहुत ज्यादा कैश हेंडलिंग चार्ज लेने लगे हैं. इसलिए इससे परहेज करना ही उचित होगा.


अब आएँ पेपर वर्क और रॉयल्टी पर.

पुस्तक प्रकाशन के लिए लेखक को प्रकाशक के साथ एक करार करना पड़ता है . जिसमें उनकी सेवाएँ, रचनाकार की जिम्मेदारी, व्यय, किश्तों की संख्या व समय (यदि आवश्यक हो तो) और उनकी अन्य शर्तें लिखी होती है. साथ में यह सब भी होता है कि पुस्तक पर यदि रॉयल्टी है तो किस तरह उसका आकलन होगा, किस तरह उसका भुगतान होगा.

इन सबके लिए लेखक को अपनी कुछ व्यक्तिगत सूचनाएं भी देनी पड़ती हैं. अपना नाम, पता, जन्म तारीख, बैंक एकाउंट की सूचना अभिभावकों के नाम, पुस्तक प्रकाशन के लिए पावर ऑफ एटार्नी और प्रकाशक के विशिष्ट फार्म पर आवेदन. इनके साथ पेन कार्ड की कापी, दो पते के प्रूफ, आधार कार्ड, चालू बैंक खाते का (रद्द किया हुआ) चेक भी संलग्न करना पड़ता है.
खास बात है कि कोई भी प्रपत्र (Document) मूल रूप में नहीं भेजना होता है. सब स्वयं प्रमाणित फोटोकापी मात्र.

प्रूफ रीडिंग पूरी होने पर प्रकाशक बकाया आधी राशि की माँग कर लेता है. उसके बाद ही पुस्तक का प्रकाशन करता है.

इस दौरान कुछ बातें विस्तार में करनी होती हैं. प्रकाशक हमेशा अधूरी भाषा में बातें करता है. कुछ लिखित में देने से डरता है या कहें परहेज करता है. हाँ बड़े प्रकाशक हों तो यह सब झंझट नहीं रहते. उन्हें उनकी साख उन्हें पकड़ती है.

जैसे पटल पर अंकित होगा कि 100 प्रतिशत रॉयल्टी पाएं. इससे एक नया लेखक समझता है कि पुस्तक के दाम 80 रुपए हों तो लेखक को प्रति पुस्तक रु.80 रॉयल्टी में मिलेंगे. पर वास्तव में ऐसा नहीं होता. पुस्तक की कीमत से लागत निकालकर उसकी प्रतिशत रॉयल्टी में दी जाती है. किंतु लागत की बात प्रकाशक कभी नहीं करता. लेखक के करने पर वह कन्नी काटता है. अंततः प्रकाशक लेखक को लागत के बारे अवगत कराने से बचता रहता है.

मेरी पहली पुस्तक दशा और दिशा के समय ऐसा ही हुआ. पेपरबैक पर 70 प्रतिशत व ई बुक पर 85 प्रतिशत रॉयल्टी बताई गई. बार बार लिखित में माँगने पर भी लागत के बारे में कुछ भी लिखित नहीं आया. प्रकाशक का जो कर्मचारी मुझसे संपर्क में था उसने मुझे बताया कि लागत रु.60 आ रही है तो एम. आर पी रु.120 रख सकते हैं. मैंने हिसाब किया (120-60) का 70 प्रतिशत रु.42.00. यानी रु42 प्रति पुस्तक रॉयल्टी.

वैसे ही ई बुक की कीमत लगाई रु.49 जिसका 85 प्रतिशत रु.41.65 होता है. एक मोटे तौर पर विचार था कि प्रति पुस्तक करीब रु.42 मिलेंगे. इसी हिसाब से कीमत पर रजामंदी दी थी.

जब ऑनलाइन देखने के मिला तब देखा प्रति पुस्तक ईबुक के तो ठीक मिल रहे हैं किंतु पेपरबैक पर रु.22.85 दिया जा रहा है. प्रकाशक को बार बार लिखने पर भी रॉयल्टी के हिसाब नहीं मिले, न ही मिला लागत का लिखित रूप. फिर खबर आई कि लागत बढ़ गई है रु.90 हो गई इसलिए एम आर पी बढ़ानी होगी या रॉयल्टी घटानी होगी. मेरी इच्छानुसार मेल भेजा गया कि लागत बढ़ गई है इसलिए कीमत बढ़ाकर रु150 करने की अनुमति दीजिए. दिया, यह सोच कर कि अब 150 व 90 के बाच 60 रु का फर्क है तो रॉयल्टी रु.42 पर आ जाएगी. लेकिन नहीं रॉयल्टी वहीं रही रु.22.85 पर और कहा गया कि पहले ही पुस्तक की लागत करीब रु 90 थी तो रॉयल्टी रु.22.85 मिल रही थी. लागत रु30 बढ़ी तो कीमत भी     रु30 बढ़ा दी. जिससे आपकी रॉयल्टी बनी रही वरना कुछ भी नहीं मिलता आपको. इस तरह प्रकाशक ने आधी रॉयल्टी का चूना लगाया. कुल मिलाकर 250 से ऊपर प्रतियाँ बिकने पर भी लागत नहीं लौटी. सारा माखन प्रकाशक ले गया. मैंने उन्हें उपभोक्ता शिकायत मंच पर लाने की बात कही है. कभी तो होगा. सारे संप्रेषण सँभाल रखे हैं मैंने. ऐसा होता है पैसों के मामलों में प्रकाशकों का व्यवहार.

इन सब से बचने के लिए प्रकाशक से लागत व कीमत पर रॉयल्टी की जानकारी करार में ही लिखित करवा लेना जरूरी होता है. हाँ इसमें प्रकाशक को बहुत तकलीफ होती है, पर धंधा करना हो, तो मानेगा. लेखक के लिए जरूरी है कि वह किसी भी तरह प्रकाशक को लिखित में देने के लिए बाध्य करे. ई बुक में ऐसी परेशानी नहीं रहती क्योंकि उसमें की अलग लागत नहीं लगती.

एक बात जो इन सबसे परे है, वह यह कि एक शर्त ऐसी होती है जिसके अनुसार जब पुस्तक प्रकाशक के पोर्टल से बिकती है उसमें तो 100% रॉयल्टी पर इनके चेनल पार्टनर पर बिके तो 70% , मतलब अलग अलग रॉयल्टी दी जाती है. पता करने से बताया जाता है कि चेनल पार्टनरों को कमीशन देना पड़ता है.

यह सब खेल हैं. प्रकाशक को चाहिए कि चेनल पार्टनर से ऐसा करार करे कि प्रकाशक के पास कीमत पूरी आए. इसके लिए वहाँ पुस्तक ज्यादा में बिकेगी. इससे प्रकाशक को फायदा है कि ग्राहक प्रकाशक की तरफ झुकेंगे. पर प्रकाशक चेनल पार्टनरों की बिक्री में भी कमाते हैं, इसलिए वे ऐसा करना नहीं चाहते.

जायज तरीका होगा कि एक कीमत तय की जाए पुस्तक की कि कितने में बिकनी है. उस पर जो कमीशन चेनल पार्टनर को दिया जाता है उसे जोड़ें . इस तरह सब चेनल पार्टनरों के हिसाब में जो सबसे ज्यादा आता है उसे एम आर पी कहा जाए. एम आर पी पर चेनलों की कमीशन के हिसाब से उन्हें डिस्काऊंट दे दिया जाए, जिससे उतने में बिकने पर कीमत के पैसे प्रकाशक तक आएँगे. प्रकाशक के पोर्टल पर सबसे ज्यादा डिस्काऊंट होगा और पुस्तक कीमत पर ही बिकेगी. पर इतनी ईमानदारी शायद प्रकाशकों को भाती नहीं है.

यह सब बातें तय होने पर ही प्रकाशक को बकाया रकम की सुपुर्दगी देनी चाहिए. अब पुस्तक पूरी तरह प्रकाशन के लिए तैयार है. प्रकाशन पर लेखक अपने सभी जानकारों को नेट पर पुस्तक के उपलब्धि की सूचना दे सकता  है. अच्छा होगा यदि प्रकाशक लेखक को लिंक दे, जिससे लेखक अपने जानकारों को लिंक देकर पेमेंट कैसे करना है, ईबुक कैसे डाउनलोड करना है, बता सकता है.

अब समझ आया होगा हमारे साथी लेखकों को कि प्रकाशन कितनी दुविधाओं से घिरा है. पुस्तक छपकर आने से खुशी तो होती है पर जब तक छप नहीं जाती पारा सातवें आसमान पर ही होता है.
............................