मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल  मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.
मन दर्पण

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

आधार --- किसका ???




आधार.

आज जहाँ भी जाइए ... पेनकार्ड, मेबाईल, पासपोर्ट, इंश्यूरेंस पालिसी, डी मेट एकाउंट, ड्राईविंग लाईसेंस, एल पी जी, रेल्वे टिकट, बैंक एकाऊंट, गाड़ी, जेवर, प्लाट, मकान की खरीददारी - किसी भी बात पर आपको आधार कार्ड का नंबर जोड़ना जरूरी सा हो गया है.  बच्चों की छात्रवृत्ति, हर तरह की पेंशन, बारहवीं की परीक्षा, यू पी एस सी की परीक्षाएं, सब जगह आधार अनिवार्य कर दिया गया है. ऐसा ही रहा तो कुछ दिन में आपको बस पास, लोकल ट्रेन का पास, सुबह का दूध  - कुछ भी नहीं मिलेगा - यदि आधार नहीं है तो. गरीबों को राशन पाने के लिए आधार नंबर चाहिए, किसानों को बीज व खाद पाने के लिए आधार चाहिए.


जब सालों पहले सरकार ने इसे शुरु किया था, तब आज की सरकार विपक्ष में थी और अपने आदतानुसार विरोध ही करती रही. वही सरकार में आ गई तो इसे ही हर तरफ से जरूरी कर  रही है. शायद सरकार में आने के बाद इस को जरूरी करने के फायदे नजर आने लगे हैं या ऐसा भी हो सकता है कि सरकार में रहने वालों को इसका फायदा होगा, इसीलिए सरकार में आने के बाद ही इनका रवैया बदला.

अब मान लीजिए किसी के आधार को रोक दिया गया. कैसे इसकी चर्चा फिर करेंगे. आपका बैंक खाता बंद, राशनपानी बंद, पासपोर्ट नहीं चलेगा, कुकिंग गैस नहीं मिलेगी इत्यादि सब बंद  -  कारण आपके आधार की पुष्टि नहीं हो पा रही है.

अमरीका में रिटायरमेंट के दिन एक कर्मचारी ने राष्ट्रपति ट्रंप का ट्विटर खाता बंद कर दिया. वैसे ही कोई किसी का आधार वेरिफिकेशन से खेले तो. मान लीजिए सरकार के बाशिंदे ही चाहें, आपको परेशान करना तो.

यह ऐसा ही किस्सा हुआ कि सारी रकम एक जेब में है  और वह कट गई... भूखों मरिए.

बरसों पहले जब नंदन नीलेकनी ने आधार की नींव रखी और तब ऐलान किया था कि इससे खास फायदे ये हैं कि सारे कार्ड एकजुट हो जाएंगे और केवल आधार कार्ड ही सबके काम आ जाएगा. एक नंबर आधार ... सब सूचनाओं का गढ़ होगा. कितनी खुशी हुई थी कि पचासों के बदले एक ही कार्ड – पेनकार्ड, ड्राईविंग लाईसेंस, वोटर कार्ड   कुछ भी साथ रखने की जरूरत नहीं पडेगी.

यही सोचकर मौका पाते ही सबसे पहले अगस्त 2011 को मैंने आधार के लिए आयरिस प्रिंट, फिंगरप्रिंट के साथ साथ सारी आवश्यक सूचनाएं व कागजात आधार वालों को दे दिए.
एक खुशी थी कि हमारे शहर में के कुछ एक पहले पहले आधार पाने वालों में मेरा भी नाम होगा.

फिर क्या दफ्तर, क्लब और समाज में आधार का मैं विज्ञापन ही करने लगा था. फार्म ला लाकर सबको बाँटने लगा. बहुतों ने तो इसमें की रुचि भी नहीं दिखाई. बहुत समझाने की कोशिश की कि बाद में भीड़ बढ़ जाएगी, अभी करवा लीजिए. पर सुनने को कम ही लोग तैयार थे.

अब समस्याएं शुरु हुईं उनकी जिन्होंने आधार के लिए पंजीयन करा लिया. कुछ के कार्ड नहीं आए, कुछ में लिंग भेद आ गया तो किसी में पिता की जगह पति का या पुत्र का नाम आ गया. पता और नाम के हिज्जों में गड़बड़ी तो आम बात थी. कई में तो जन्मतारीख भी बदल गई. इनको सुधरवाना एक बड़ी मुश्किल थी.

जिनको कार्ड नहीं मिला उनसे कहा गया नेट पर खोजिए, तरीके बताए गए पर बहुत समय तक तो नेट पर मिल ही नहीं पाया. मुझे तो कार्ड दो साल बाद 2013 में मिला . एक नेट सर्विस प्रोवाइडर की सहायता से.

सही में नेट से पता चला कि  किसी अन्जान कारण से मेरा कार्ड अंबेडकर यूनिवर्सिटी आगरा पहुँच गया. जब आगरा के दोस्तों से बात किया तो एक ही जवाब मिला कि वह तो नहीं मिलेगा एक नया बनवा लो. पर आधार वालों ने तो नया बनाने से मना ही कर दिया और यह सुझाव दिया कि नेट से आप प्रिंट ले लें और लेमिनेट करवा लें जो मान्य होगा.
अंततः वैसा ही करना पड़ा.

बहुतों से तो कहा गया कि अप्रेल 2013 के पहले बने कार्ड यदि नहीं पहुँचे हों, तो नेट से जाँच ले. यदि बन गए तो नेट, से प्रिंट ले लें और नहीं बने तो फिर से पंजीयन करा लें.
ऐसी हुईं मुसीबतें आधारके साथ.

इतना ही नहीं , जब हर नागरिक का आधार कार्ड बनना था तो मुसीबत डाकियों की भी हुई. परेशान होकर कई डाकियों ने इन्हें मंजिल से पहले ही निपटाना चाहा. समय समय पर नाले में, कूड़े के ढ़ेरों मे बेहिसाब आधार कार्ड मिले लोगों को, पर वे भी सही मंजिल देख नहीं पाए.

धीरे धीरे सरकार ने शिकंजा कसना शुरु किया कि आधार जरूरी है और सब इसे बनवाएं.
उस समय आज का सरकारी दल जो विपक्ष में था, आधार का हर तरह से विरोध कर रहा था. पता नहीं इस पर क्या क्या कहा गया. सरकारी पैसों का नाजायज इस्तेमाल शायद सबसे छोटी तोहमत थी. निजता पर हमला और संविधान के मूल अधिकारों का हनन शायद प्रमुख थे.

मई 2014 में जब यह दल सरकार में आया तो शायद इन लोगों ने आधार परियोजना को पूरा पढ़ा और समझा. तब इनके भेजे में बात आई होगी कि पुरानी सरकार आधार पर जोर किसलिए दे रही थी. अब इन लोगों ने पलटी मारा और आधार पर जोर देना शुरू किया. धीरे धीरे करते हुए आधार मोबाइल सिम कार्ड, कुकिंग गैस, बैंक खाते, इंश्यूरेंस पालिसी, पेन कार्ड, पेंशन, छात्रवृत्ति, किसानों के बीज, गाड़ी, जमीन - मकान की खरीद फरोक्त, बैंक को लोन, 50 हजार से ज्यादा पैसे जमा करने निकालने और न जाने कहाँ कहाँ जरूरी कर दिया है.  पर निजता का और मूल अधिकारों का हनन अब नजर नहीं आता

उधर कईयों ने तो न्यायलयों में वाद – याचिकाएं दायर की हैं. न्यायालयों ने भी कई बार कहा है कि आधार जरूरी नहीं है पर सरकार अब न्यायालयों से भी ताकतवर हो गई है. अब सरकार पर न्यायालयों के आदेशों का कम ही असर होता है.

मेरी राय में  - यदि ईमानदारी बरती जाए तो आधार जैसा सूचना केंद्र बहुत ही काम का है. पर ईमानदारी रहे तो . अन्यथा बेइमान लोग आधार से खेलकर लोगों को तबाह कर सकते हैं.

अभी कुछ समय पहले सेवानिवृत्त होते हुए एक कर्मचारी ने अमेरिका के अध्यक्ष ट्रंप का (शायद ट्विटर) ही  खाता बंद करके चला गया. यदि अमेरिका में इस तरह की घटना हो सकती है, तो भारत की सोचिए.


हमारे देश में लोग डिजाइन व प्लानिंग में विश्वस्तर के या उससे बेहतर हैं किंतु क्रियान्वयन के मामले में हम बदतर से भी बदतर हैं. बेईमानी, ना-इंसाफी  और घूसखोरी हममें कूट कूट कर भरी है. इस लिए इस सूचना केंद्र का दुरुपयोग निश्चित है. बस बात समय की है. जिस देश में सरकार, योजना आयोग, मिलिटरी के कंप्यूटरों पर अनेक देशों के लोगों द्वारा हमला हो सकता है, सेंध मारा जा सकता है उस देश में आधार केंद्र पर सेंध मारना कितना नामुमकिन है. यदि एक बार ये सेंध मारा गया तो समझें सबकी सब सूचनाएं सार्वजनिक हो गईं और इनका नाजायज इस्तेमाल हो सकता है. इसके अलावा बेईमानी के लिए सूचना सार्वजनिक करना भी असंभव नहीं कहा जा सकता.

यदि सरकार ऐसी सुरक्षा कर भी लेती है तो भी सरकार के हाथ में तो ऐसी सुविधा है कि जब चाहे जिसका चाहे आधार सूचना रोक दे. यदि ऐसा हुआ तो उस नागरिक का तो जीना दूभर हो जाएगा. सब कुछ एक साथ बंद हो जाएगी. ये तो इंदिरागाँधी के आपालकाल में भी नहीं हुआ था. एक वीडियो सार्वजनिक पटल पर चल रहा है. मैं यहाँ दे रहा हूँ देखिए कि कैसी मुसीबत हो सकती है जब आधार की सूचनाएं लोगों को मिल जाती हैं.



पता नहीं मूल किसका है मेरा आभार मूल पोस्ट धारक को. संभव हुआ तो आप भी देखिए.




आज भी आधार का मूल मामला उच्चतम न्यायालय में चल रहा है. मुद्दा है कि आधार निजता का हनन है या नहीं. न्यायालय पहले ही कह चुका है कि निजता का अधिकार संविधान के मूल अधिकारों में समाया है. यदि आधार को निजता का हनन माना गया तो इसका सभी योजनाओं से जोड़ना गलत हो जाएगा. पर जिनके आधार जहाँ तहाँ जुड़ गए उनका क्या होगा ?

अभी तक न्यायालय ने आधार को किसी भी परियोजना से जोड़ने संबंधी किसी भी विषय पर रोक नहीं लगाई है. इससे साफ नजर आता है कि जवाब जोड़ने के पक्ष में ही होगा अन्यथा सरकार को स्टेटस कोरखने को कहा जाता, पर ऐसा नहीं हुआ.

सरकार ने इस मामले में न्यायालय की भी नहीं मानी है. कई बार तो सरकार को न्यायालय ने रोका कि जनता को मजबूर न करें कि आधार जोड़ें, न ही किसी सुविधा को पाने में रोक लगाएँ. किंतु सरकार कार्यक्रम में सीधे आगे बढ़ रही है और जनता को धमका तक रही है कि यदि आधार नहीं जोड़ा तो मोबाईल बंद, पेंशन बंद, छात्रवृत्ति बंद, बैंक खाता जाम, हवाई टिकट बंद और कई सारे बंधन. और तो और लोग यू पी एस सी और बारहवीं का परीक्षा से वंचित किए जा रहे हैं, आधार नहीं होने पर. यह किसी भी कीमत पर आतंकवाद से कम है क्या ?  जमीन , मकान , गाड़ी का पंजीयन नहीं हो रहा है. ड्राईविंग लाईसेंस नहीं बन रहा है.  आधार होने पर एक को महीने में 9 रेलवे टिकट मिलते हैं वरना केवल 6.

अब भी न्यायालय ने सरकार से कहा है कि जब तक फैसला नहीं आ जाता आधार को जोड़ने की अंतिम तारीख बचाकर रखें, पर सरकार ने तो सीधे ही मना कर दिया. न्यायालय ने फिर लगातार सुनवाई करने का निर्णय लिया था. अब हार कर न्यायलय ने ही नई तारीख 31 मार्च का ऐलान किया है.

सरकार न्यायलय पर नाजायज दबाव बना रही है. देखिए न्यायालय कौन सा रुख अपनाता है.

उधर बंगाल की मुख्यमंत्री ने न्यायालय में दावा किया कि सरकार का आधार से जोडने की जबरदस्ती नाजायज है. न्यायालय ने भी कह दिया कि आप व्यक्तिगत रूप से वाद दायर कर सकती हैं, मुख्यमंत्री के रूप में नहीं. पर मुख्यमंत्री को भी गलत ही लगा ना.

हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार में पढ़ने को मिला निम्न अंश देखिए :



Quote –

For BREXIT a statement came  :

“The undefined being negotiated by the unprepared in order to get unspecified for the uninformed.”
  
If the ethics are not followed the it can be well used to define  Aadhaar

Only applications of the schemes in future will confirm us IF  - in long-run it is   
A Mad disastrous idea or the Best idea India ever had.

ON DATE NONE KNOWS CLEARLY.

Unquote.


लेकिन जीवन के अनुभवों से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हमारे देश में डिजाइन और प्लानिंग तो दुनियाँ में बेहतर के समकक्ष या उससे भी बेहतर होता है पर उसका क्रियान्वयन बदतर से भी बदतर है. पैसों के लिए कोई भी इन सूचनाओं को बाजारू कर सकता है. बस एक सौदा मतलब सारा धराशायी. कितनों की आफत आएगी भगवान ही जाने. सरकार चाहे तो किसी को भी सूचना मुहैया करा सकती है. गूगल जिस तरह आपके फोन पर किए हर गतिविधि पर ध्यान देता है और उसकी डाटा का हैक होना जिस तरह आपको परेशान कर सकता है उसी तरह यह भी है, पर यह अत्यधिक निजी सूचना है इसलिए नुकसान असीमित होगा.

आई टी के प्रस्तुत हालात और माहौल में इतनी सुरक्षा मुमकिन नहीं लगती है. पता नहीं जो भगवान के दायरे में भी नहीं है उसकी गारंटी सरकार कैसे ले सकती है.

आधार संस्थान ने दो चार दिनों के भीतर ही एअरटेल मोबाईल व एअरटेल बैंक का लाइसेंस को निलंबित किया है. वह इसलिए कि उन्होंने बिना सूचना के आधार सूचनाओं का गलत बात के लिए प्रयोग किया है.

आधार के प्रबंधन करने वालों की मानसिकता कितनी न्यायोचित है इस का निर्णय करने के लिए आप निम्न विषयों पर  विचार करें -

1. उच्च व मध्यम वर्गीय परिवारों को सब्सिडी से वंचित कर दिया गया है पर साँसदों और विधायकों की सब्सिडी अभी भी य़थावत् कायम है.
2. आधार को दुनियाँ भर के परियोजनाओं व सुविधाओं से जोड़ना जरूरी कर दिया है और बिना उसके सुविधा को स्थगित करने तक की मुहिम चलाई जा रही है. पर आधार को राजनीतिक दलों को अनुदान याकहें चंदा से नहीं जोड़ा जा रहा है.
3. वोटर कार्ड और वोटरॉलिस्ट अभी भी आधार के दायरे से बाहर है. शायद इसे आधार से जोड़ने पर फर्जी
वोट और वोटिंग बंद हो जाएगी.
कल ही वाट्सप पर एक मजाक आया --

सोमालिया में चुनाव में वोटिंग के लिये इंडिया से evm मशीन मंगा ली।

वोट गिनती में बीजेपी की सब से ज्यादा वोट निकली



पेटेंट है।

ये तो मजाक था पर रत्ती भर भी ऐसा रुझान हो तो हमारी सूचनाओं का आधार कितना सुरक्षित है सोचिए
…..

Aadhar --- overview.

रविवार, 10 दिसंबर 2017

एकाकी पंछी.

मेरे परिचित शिक्षिका श्रीमती मीना शर्मा जी की एक कविता प्रस्तुत है :

एकाकी पंछी
**********
जहाँ सूर्य डूबा, बसेरा वहीं !
खुले दृग जहाँ पर, सबेरा वहीं !

मैं एकाकी पंछी, विलग यूथ से
ना झंझा की चिंता, ना डर धूप से !
बहारों से मैं क्यों करूँ याचना,
कुंजों में मेरा तो डेरा नहीं !
खुले दृग जहाँ पर सबेरा वहीं !

मेरा प्यार सूखे से तरुओं की खातिर,
खिलें नन्हीं कलियाँ, मेरी जान हाजिर !
नहीं कोई सरहद, ना अपना पराया
आसमां कौन सा, जो कि मेरा नहीं !
खुले दृग जहाँ पर सबेरा वहीं !

है पंखों में ताकत औ' खुद पे यकीं,
जहाँ मन लगे मेरी मंजिल वहीं !
सितारे चुरा लूँ, कि वह चाँद पा लूँ
कोई स्वप्न ऐसा उकेरा नहीं !
खुले दृग जहाँ पर सबेरा वहीं !

जहाँ सूर्य डूबा, बसेरा वहीं !
खुले दृग जहाँ पर, सबेरा वहीं !
------------
श्रीमती मीना शर्मा

सोमवार, 13 नवंबर 2017

संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षापरिषद और वीटो.


संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षापरिषद और वीटो.

अभी पूरे विश्व की नजर उत्तरी कोरिया पर है. कब वह खुराफात करे और भयंकर अंजाम हो जाएं, यह कोई नहीं जानता. खासकर उसकी नजर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका पर है और उधर अमेरिका की पैनी नजर उत्तरी कोरिया पर.

इस उत्तरी कोरिया ने हाल के, आई सी बी एम, परमाणु  और हाइड्रोजन बम के परीक्षण से खासकर अमेरिका और साधारणतः सारे विश्व में दहशत फैला दिया है.
अब बात आती है कि उत्तरी कोरिया को यह क्या सूझी कि वह अमेरिका से भिड़ जाए.

ये अमेरिका ही नहीं बल्कि सुरक्षा परिषद के जो पाँचों स्थिर सदस्य वीटो पावर (चाईना, फ्राँस, रशियन फेडेरेशन, युनाईटेड किंगडम और युनाईटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका) हैं उन सबकी एक ही हालत है. सबका एकमत है कि दुनियाँ में भले कुछ हो जाए कोई देश, ताकत हम तक न पहुँचे. इस मामले में ये पाँचों एकजुट हैं भले ही अंदर दूसरे मतभेद होंगे. हो सकता है उनमें ऐसा कोई गोपनीय करार भी हो. जब से सुरक्षा समिति बनी है ये सब एक मत हैं.

याद कीजिए जब भारत ने पोखरण में परमाणु विस्फोट किया था. यही हाल था इन सबका. सारे विश्व को भड़काने में लगे थे. पर खोदा पहाड़ निकली चुहिया , वह भी मरी हुई. उधर जब ईरान ने परमाणु संयत्र लगाए और यूरेनियम जुटाना शुरु किया तो फिर अमेरिका को तकलीफ हुई.

ये सारे वीटो वाले देश तो अपने पास भरमार परमाणु बम (अस्त्र) बना कर सँजो रखे हैं किंतु अन्यों को परमाणु अस्त्र बनाने से रोकते हैं. यह दादागिरि नहीं तो क्या है. ये पहले अपने अस्त्र खत्म क्यों नहीं करते ? ऐसा करने से विश्व के देशों को विश्वास हो जाएगा कि ये वीटो देश सही में विश्व शाँति के हित में कार्य कर रहे हैं. अन्यथा ऐसा लगने लगा है कि ये अपने को सर्वशक्तिमान कहाने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं.

यदि ऐसा है तो विद्रोह निश्चित है. कल भारत ने किया , फिर ईरान ने, अब उत्तरी कोरिया कर रहा है. कल कोई और करेगा. इन वीटो धारियों का यही रवैया रहा तो कोई सिरफिरा नेता किसी दिन जरूर परमाणु अस्त्र का प्रयोग कर देगा जो तीसरा विश्वयुद्ध साबित होगा और उसके प्रणेता ये वीटोधारी ही कहलाएंगे.

पता नहीं जापान और जर्मनी इन वीटो पावर वाले देशों के रवैये पर चुप क्यों हैं. उनके पास भी पर्याप्त शक्ति है. अमेरिका तो काफी हद तक पोलेंड और जापान से निर्यातित वस्तुओं पर निर्भर है. क्या पता उनमें भी कोई आपसी संधि हुई हो.

पिछले किछ वर्षों से भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के  सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की कोशिश में लगा है. बात यहाँ तक आ गई कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता तो दी जाएगी पर बिना वीटो के. अब इससे ही अंदाज लगा लीजिए कि ये वीटो वाले देश किस तरह से गुटबाजी पर उतर आए हैं. इनके लिए उत्तरी कोरिया के किम ही सही समाधान हैं.

अब समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में ही वीटो हटाने का कोई प्रस्ताव पारित हो और इन सब वीटोधारियों को भी सामान्य देशों की फेहरिस्त में लाया जाए.

यदि अब भी अमेरिका अपने आपको महाशक्ति मानकर दुनियाँ में गुंडागर्दी की ठेकेदारी करेगा तो किसी दिन वह किसी सिरफिरे को भड़काकर तीसरे विश्वयुद्ध का कारक बनेगा और वह होगा दुनियाँ के तबाही का कारण.
...... 

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

आँखों देखी.



आज दिन में एक वाट्सप फ्रेंड ने यह आँखों देखी खबर भेजा.
आप सब के रसास्वादन हेतु प्रस्तुत है...

आँखों देखी

    एक चिड़ा लगातार कोशिश कर रहा है 
    अपने बच्चे को उड़ना सिखाने की                       
    मैं हैरान हूँ देखकर कि किस तरह
    वह  कुछ कहकर जा रहा है                
    अपने बच्चे से....                       
    और आज्ञाकारी बच्चा 
    वहीं बैठा रहता है
    पिता के आने तक                       
    चूँ भी नहीं करता                       
    
    पिता चोंच में दाना लेकर लौटता है
    बच्चा बुरी तरह पंख फड़फड़ाकर 
    अपनी खुशी जाहिर करता है                       
    पिता चोंच में दाना देता है                       
    खिलाने के बाद 
    जाली से चोंच रगड़कर 
    दिखाता है कि ऐसे करो                       
    
    बच्चा अनुकरण करता है                       

    (आपने चिड़ा लिखा
    पता है कि वह चिडिया नहीं है..?
    जमाना तो उल्टा है. 
    कोई कहानी बन रही है
    या कविता...)
                 
    
    और हाँ, वह चिड़िया नहीं है
    चिड़ा ही है                      
    चिड़ा गहरे रंग का होता है
    गले के नीचे काला धब्बा होता है                            

    फिर पिता बच्चे को 
    पंख फड़फड़ाकर उड़ना सिखाता है 
                                     
    बच्चा कोशिश करता है
    गिरने को होता है                       
    पिता की ओर लपकता है 
    सहारे के लिए
    लेकिन पिता 
    पास आकर थामता नहीं                       
    उलटे और दूर सरक जाता है                       
    
    अब पिता बच्चे की ओर मुँह घुमाकर
    कुछ हल्की चूँ चूँ करके
    मानो कुछ समझा रहा या डाँट रहा है। 
    फिर वहाँ से उड़ जाता है 
    जरा नीचे के छज्जे पर जाकर बैठता है                       

    अब बच्चा क्या करे ?                       
    
    मजबूर होकर पंख फड़फड़ाता है 
    और 
    अपनी उड़ान भरकर पिता के पास !                       
    खुशी के मारे चिड़ा चहचहाए जा रहा है....                       

    काश हम इंसान भी ऐसा कर पाते !                        
    
    अभी भी दोनों बालकनी में ही हैं

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सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

डिजिटल इंडिया - मेरा अनुभव.

डिजिटल इंडिया – मेरा अनुभव.

उस दिन मेरे मोबाईल पर फ्लेश आया. यदि आप जिओ का सिम घर बैठे पाना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करें. मैंने क्लिक कर दिया. मुझे अपना नाम पता, आधार नंबर देने को कहा गया. मैंने दे दिया. फिर मुझसे पूछा गया कि आप जिओ सिम कब और कहाँ चाहते हैं. पता और समय देने पर बताया गया कि उस वक्त दिए हुए स्थान पर, मैं अपने आधार कार्ड के साथ मौजूद रहूं.

समय से आधे घंटे पूर्व फोन आया. फोन करने वाले ने बताया कि वह जिओ से बात कर रहा है और मुझे सिम देना चाहता है. मैंने बताया कि मेरे पास आधार कार्ड है, पर मैं अपने पते पर नहीं हूँ. हाँ पास में ही हूँ. उसने मेरा पता माँगा और 20 मिनट में उस पते पर पहुँच गया.

उसने मेरा आधारकार्ड माँगा नंबर नोट किया, उसका फोटो लिया और एक फिंगरप्रिंट लिया, जिससे मेरे फोन पर एक ओटीपी नंबर आया. उसने उसे कहीं भरा और हस्ताक्षर करवा कर सिम कार्ड देकर चला गया. मोबाईल पर मेसेज आया कि आपका आधार नंबर वेरिफाई हो गया है.

पूरी कार्रवाई में ज्यादा से ज्यादा कोई कहिए आधा घंटा लगा होगा.
.....

कुछ दिन बाद मेरे एक दोस्त का फोन आया मुंबई से और उन्होंने बताया कि जीवन प्रमाण के एवज में उनको तीन महीने से पेंशन नहीं मिल रही है. तब मुझे लगा कि मुझे खुद का भी देख लेना चाहिए. जाँच में पता चला कि मई 17 के बाद की पेंशन राशि आई ही नहीं. हालाँकि राशि कोई दो हजार रुपए प्रतिमाह है, पर वह भी नहीं आई.

तब जाग आई. बैंक से बात किया तो वहाँ से जवाब मिला सर आपका लाईफ सर्टिफिकेट नहीं भेजा होगा. मैंने उन्हें याद दिलाया कि भेजा था , आपसे बात भी हुई थी. आपने आधार की कापी माँगी थी, वह भी भेजा था. तब बोले ओह आपका तो किसी राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर से आया था ना. मुझे लगा मामला अब सुलझ गया, लेकिन नहीं. मुझे बताया गया कि मई 2017 के बाद डिजिटल लाईफ सर्टिफिकेट ही मान्य होंगे. ये है डिजिटल इंडिया का पहला स्वाद. न कोई मेल , न कोई संदेश, न कोई पत्र - बस पेंशन बंद करके बैठ गए. जिसको तकलीफ होगी हाथ पैर मारेगा.

उनके एक ग्लोबल कमाँड से सारे पेंशनरों को मेल चला जाता कि मई से पहले पहले सबको फिर से डिजिटल सर्टिफिकेट देना है या फिर उसे अगले सत्र से लागू करते. इस डिजिटाइजेशन का क्या फायदा ? पर सरकार है हक है करो परेशान!!!  बूढ़े हैं तो क्या हुआ? जरूरत है तो दौड़ेंगे.

चलें आगे बढ़ें. बैंक वालों से विनती करके मैंने पी एफ कार्यालय के नंबर लिए. मेरी एक अलग मुसीबत भी यह है कि मैं रहता हैदराबाद हूँ, पर मेरा पेँशन खाता छत्तीसगढ़, कोरबा में है. मुझे बिलासपुर और रायपुर कार्यालय के नंबर मिले. रायपुर में किसी ने फोन नहीं उठाया, पर बिलासपुर से जवाब मिला. उनका कहना था कि मुझे रायपुर या बिलासपुर जाकर वहाँ व्यक्तिगत तौर पर फिंगरप्रिंट देकर जीवन प्रमाण देना होगा. मैंने सोचा, 2000 रु मासिक के लिए 6000 खर्च कर रायपुर/ बिलासपुर जाऊँ.

मैंने बात आगे बढ़ाया. जनाब इस डिजिटल इंडिया के जमाने में भी क्या वहाँ जाना ही पड़ेगा?  मैं हैदराबाद में रहता हूँ, यहाँ भी तो कोई ईपीएफओ का दफ्तर होगा. तब फिर उन्होंने सलाह दिया कि आप अपना पेशन पेमेंट अथॉरिटी, आधारकार्ड और पेंशन वाले बैंक का पास बुक (प्रथम पृष्ठ सहित) लेकर हैदराबाद के क्षेत्रीय कार्यालय में जाएं तो वहां से यह काम हो सकता है. 
चलिए मैं ईपीएफओ के क्षेत्रीय कार्यालय पहुँचा. एक कमरे में दो लिपिक बैठे हैं और वे ही लोगों का जीवन प्रमाण तय कर रहे हैं. कमरे में कोई 100-150 लोग बैठे होंगे. 52 नंबर का टोकन चल रहा था. मेरा टोकन नंबर 95 था. बात साफ थी कि 3 घंटे पहले तो नंबर आने का कोई मतलब ही नहीं इस बीच लंच ब्रेक भी होना था. मैं 11 बजे पहुंचा था और मेरा नंबर 3 बजे आया. खाना तो गया. तब तक कैंटीन भी सूख गई थी.

वहाँ मैंने पता किया कि पूरे हैदराबाद-सिकंदराबाद जुड़वाँ शहर में क्या और कोई जगह है जहाँ यह काम हो सकता है ? तो जवाब मिला नहीं, यहीं आना होगा. पूरे शहर व आस पास के इलाकों से बुजुर्ग जिनकी कमर पूरे धरातल तक झुक गई है, वहाँ आकर बैठे हैं. किसी को उम्र का लिहाज भी नहीं. 61 साल का व्यक्ति और 90 साल की बूढ़ी दोनों एक ही कतार में हैं. कोई रियायत या सुनवाई नहीं.

उस पर वहाँ जो सुनने मिला वह तो और भी हैरान करने वाली बात थी. लोग स्टेट बैंक एवं अन्य बैंकों से जीवन प्रमाणपत्र लेकर आए थे. उनका कहना था कि वे दो बार जीवन प्रमाणन कराकर जा चुके हैं, पर पेंशन न हीं आई इसलिए फिर आए हैं.

70-75 साल की आयु के इन लोगों (वहाँ 85 साल तक के लोग थे कमर झुकी हुई) की ऐसी हालत पर तरस आता है.
.....
अब आईए मुद्दे पर.

जब इंडिया डिजिटल नहीं हुआ था तब जो लोग अपने पेंशन वाले बैंक ब्राँच में जा सकते थे, वे वहाँ जाकर जीवन प्रामाण बैंक अधिकारी को दे आते थे. जो दूसरी जगह होते थे वे किसी राजपत्रित अधिकारी या बैंक मेनेजर से अपने हस्ताक्षर प्रमाणित कर उस प्रमाणपत्र को पेंशन वाली बैंक शाखा में भेजते थे और पेंशन लग जाती थी.

अब इंडिया डिजिटल हो गया है. तो कोई प्रमाणपत्र मान्य नहीं है. उम्र हालत कुछ भी हो जीवलन प्रमाणन के लिए ईपीएफओ कार्यालय जाकर ही फिंगरप्रिंट देना है. जो हैदराबाद जैसे वृहत जुड़वाँ शहर में भी एक ही है. जिसकी हालत का ऊपर जिक्र है.

जनता समझे कि इस तरह कि डिजिटल इंडिया से किसका भला हुआ.
जो लोग इससे संबंधित हैं उन्हें चाहिए कि इसका जायजा लें और कम से कम पुरानी सुविधा को तब तक बहाल रखें जब तक नई डिजिटल इंडिया की प्रणाली खुदपूर्णतः प्रमाणित नहीं हो जाती.
....

जिओ वाला सिम देने के लिए आधे घँटे में घर आकर आधार से प्रमाणन कर लेता है, पर सरकार के बाशिंदे पेंशन के लिए इस तरह परेशान हो रहे हैं या कहूं किए जा रहे हैं.
...
भला हो उस चंद्रबाबू नायडू का जिसने संयुक्त आँध्र में डिजिटीजेशन किया. हाईटेक सिटी दी. जगह जगह ई सेवा , मी सेवा (आपकी सेवा) केंद्र खुलवाए जहाँ से आधार कार्ड, राशन कार्ड, पेन कार्ड बनवाए जा सकते हैं, बदलाव करवाए जा सकते हैं . बिजली पानी के बिल हाउसटेक्स भर सकते हैं. जाति प्रमाणपत्र पा सकते हैं. इस सरकार को चाहिए कि कम से कम यहाँ पेंशन के लिए जीवन प्रमाण को भी इस संस्था से जोड़ दे ताकि लोग अपने नजदीकी कार्यालय में जाकर जीवन प्रमाण दे सकें.

अच्छा हो अन्य राज्यों की सरकारें इसकी अनुकृति कर लें ताकि बुजुर्गों को उचित सुविधा मिल सके.
.......

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

राष्ट्र गान का आदर




राष्ट्र गान का आदर

हाल ही में एक खबर पढ़ने को मिली सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने न्याय पर पुनर्विचार कर सरकार को निर्णय लेने को कहा है कि राष्ट्रगान को सिनेमा हाल में बजाने के बारे कोई ठोस निर्णय ले.

इस बारे में पहले आए न्याय के समय मैंने अपनी राय दी थी . जब अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी कह दिया तो सरकार उन मुदेदों के साथ इन पर भी विचार कर ले.
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बेंगलूरु में एक सिनेमा हॉल में चार लोगों को अन्य दर्शकों ने हॉल के बाहर खदेड़ दिया क्योंकि वे चारों राष्ट्र - गान बजने के समय खड़े नहीं हुए. बात तो साफ है कि राष्ट्र - गान का हर भारतीय को आदर करना चाहिए. उसका आदर न करना देश से प्रेम न दर्शाने के समतुल्य है.


बाद में तहकीकात पर बताया गया कि उनमें से एक व्यक्ति के घुटनों में तकलीफ थी. माना कि उनकी बात में सचाई है फिर भी वह व्यक्ति तो सिनेमा हॉल के भीतर तक तो बैठे - बैठे नहीं आया होगा. बाकी तीनों के पास क्या जवाब था इसके बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं है.

राष्ट्रीय गान केवल 52 सेकंड का होता है, एक मिनट से भी कम का. जो व्यक्ति पार्किंग से सिनेमा हॉल की सीट तक चल कर आ सकता है वह एक मिनट से भी कम के राष्ट्रीय गान के लिए खड़ा नहीं हो सका, अजब बात है. चलो हालातों के दायरे में यदि उसे बख्शा भी गया तो बाकी तीनों क्यों नहीं खड़े हुएयह एक भारी भरकम सवाल है.

मुझे याद आ रहा है कि पहले भी कम से कम एक बार तो यह मुद्दा उठा था. तब भी सिनेमा हॉल में ही राष्ट्रीय गान के निरादर की बात थी. उन दिनों सिनेमा के अंत में राष्ट्रीय गान बजाया जाता था. बाहर निकलने की भागमभाग वाली भीड़ में परेशानी तो थी ही. जवान छोकरे उस भीड़ में युवतियों के साथ बदतमीजी भी करते थे. इस भीड़ की तकलीफ से बचने के लिए, खास कर जो लोग इसे दूसरी या ज्यादा बार देख रहे हों, सिनेमा खत्म होते ही या कुछ लोग सिनेमा खत्म होने के पहले ही उठ कर चलने लगते थे कि भीड़ में फंसने से बच जाएं और उसी समय में राष्ट्र गान बजने लगता था. लोग भीड़ से बचने के लिए सीधे गेट की तरफ चले जाते थे. जब कुछ सहृदयों ने इस पर सवाल उठाया तो सिनेमा हॉल में राष्ट्र गान बजाना बंद कर दिया गया. न जाने कब फिर यह शुरु हो गया और फिर वही हालात उभरने लगे. बस फर्क इतना है कि पहले राष्ट्र गान सिनेमा के बाद बजता था, अब पहले बज रहा है.

राष्ट्र गान चाहे कभी भी बजे, भारतीयों को और भारत में रह रहे विदेशी या पर्यटकों को, खड़े होकर उसका आदर करना ही चाहिए. आजकल तो स्कूलों में भी सुबह सुबह राष्ट्र गान गाया जाता है. हर गली मोहल्ले में स्कूल खुल गए हैं. रिहाईशी इलाकों में भी लोग घरों में स्कूल खोल चुके हैं. इससे घर के हर कोने में राष्ट्र गान सुनाई देता है. यह एक मुसीबत की जड़ सी हो गई है. घर में आदमी कहीं भी हो उसे खड़ा तो होना चाहिए, किंतु घरों में ऐसे कोने भी होते हैं जहाँ बैठा हुआ आदमी खड़ा हो नहीं सकता. उसकी मजबूरी दोनों तरफ हो जाती है.

यह राष्ट्र गान की बेइज्जती नहीं बल्कि गलत तरीके सा राष्ट्र गान बजाने के दायरे में आना चाहिए.


अधिकारियों को चाहिए कि इस तरफ भी ध्यान दें और राष्ट्रगान को गलत तरीके से बजाने पर कुछ पाबंदियों का प्रावधान किया जाना चाहिए. वैसे सिनेमा हॉल में भी लोग मौज मस्ती की मानसिकता से आते हैं. इसलिए मेरी राय होगी कि सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाने पर पाबंदी लगा दी जाए. लेकिन जब तक यह पाबंदी नहीं होती और राष्ट्रगान बजाया जाता है तो हरेक भारतीय को और यहाँ पर रह रहे या आए विदेशियों और पर्यटकों को हमारे राष्ट्रगान का आदर करना चाहिए. हमारे देश में तो राष्ट्रगान पर भी विवाद खड़े किए गए हैं लेकिन आज तक तो यह राष्ट्रगान है.

आज कल तो लोगों में फेशन सा चल पड़ा है कि कोई भी गाना, भजन, वैदिक श्लोक, यहाँ तक कि गायत्री मंत्र व महा मृत्युंजय मंत्र को भी चौपहिया वाहनों के रिवर्सिंग हॉर्न सा लगा लेते हैं. जय जगदीश हरे का भजन रिवर्सिंग हॉर्न के रूप में कितना गंदा लगता है. भगवान ना करे कि कोई इसी लय में कभी राष्ट्रगान का भी प्रयोग करे. यदि अधिकारी इस पर ध्यान न दें तो ऐसी गंभीर समस्या भी सामने आ सकती है.

मेरा विनम्र निवेदन होगा कि सरकार इस विषय पर गंभीरता से सोचे विचारे और राष्ट्रगान के अनादर व दुरुपयोग पर आवश्यक पाबंदी लगाए.
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रविवार, 22 अक्तूबर 2017

साजन के गाँव में.

साजन के गाँव में.


आज मत रोको मुझे,
साजन के गाँव में,
सुनो मेरी छम छम,
बिन पायल के पाँव में.

आलता मँगाऊँगी मैं,
मेंहदी  रचाऊँगी मैं,
सासु, ननदों को भी,
मेंहदी लगाऊँगी मैं.

झूला झूलेंगे 
मिलकर सावन में
नाचत हमें मोर मिलें
कितने कानन में
मिल जुल कर मजे करें,
पीपल की छाँव में,
सुनो मेरी छम छम,
बिन पायल के पाँव में.

देवर, जेठ भी अपने होंगे,
साकार ननद के सपने होंगे.
रंग-बिरंगी कलाइयाँ होंगी,
इक दूजे की बलाइयाँ लेंगी

सबका साथ निभाऊँगी मैं
सबका प्यार कमाऊँगी मैं,
सास ससुर की होगी सेवा,
मेरी ही बस होगी मेवा.
महावर लगाऊँगी मैं,
भौजाई के पाँव में
सुनो मेरी छम छम 
बिन पायल के पाँव में।
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रविवार, 15 अक्तूबर 2017

धड़कन




धड़कन

संग है तुम्हारा आजन्म,
या कहें संग है हमारा आजन्म.

छोड़ दे संग परछाईं जहाँ,
उस घनेरी रात में भी,
गर तुम नहीं हो साथ, 
तो जिंदगी का खेल 
समाप्त  !!!!!

क्यों लगी हो होड़ करने,
समय से तुम अकेली ?

और भी तुझको मिलेंगे,
चाँद तारे और धरती,
और संग संग इस धरा के,
चल रहा हूँ मैं भी लेकिन,
तुम मुझमें भी बसी हो.

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